भारत के महान सपूत: डॉक्टर हरगोबिंद खुराना
जन्म शताब्दी के उपलक्ष में
भारत के महान सपूत, नोबेल पुरस्कार विजेता डॉक्टर हरगोविंद खुराना (9 जनवरी 1922 से 9 नवम्बर 1911 तक) की जन्म शताब्दी पर आज हमारा शत शत नमन। 1968 में आज़ाद भारत में विश्व का सर्वोच्च सम्मान पहली बार किसी भारतीय को मिलने से पूरे देश में ख़ुशी और गर्व की लहर दौड़ गई थी। इस से पहले 1913 में रबिंदरनाथ टैगोर को और 1930 में सी वी रमन को नोबेल पुरस्कार मिले थे। परन्तु तब भारत अंग्रेज़ों के कब्जे में था। आज उन की जन्म शताब्दी पर शायद देश उन्हें भूल सा गया है। हमें भी उन की जन्म शताब्दी का ध्यान तब आया जब उन के पौत्र के द्वारा उन के बारे में लिखा लेख मैंने पढ़ा। हम अपनी भूल को स्वीकार करते हैं।
जिस आविष्कार के कारण डॉक्टर खुराना को पुरस्कार मिला था उसी के कारण आज के वैज्ञानिक कोरोना जैसी बीमारी का वैक्सीन और इलाज ढूंढ़ने में कामयाब हुए हैं। सामान्य पाठक शायद उनके आविष्कार को ना समझ पायें परन्तु मैं कोशिश कर के देखता हूँ। हर प्राणी का जन्म उस की माँ के पेट में एक बीज से होता है जिस को उस के पिता के शुक्राणु का स्पर्श मिलता है तो जीव पैदा होता है। इसी तरह से हर पेड़ पौधे का विकास भी एक बीज के अंकुरित होने से ही होता है। इस छोटे से बीज में ऐसा क्या होता है जिस से इतना बड़ा जीव बन जाता है या पेड़ पौधा बन जाता है। और फिर हमेशा आम के बीज से आम ही उत्पन होता है और नीम के बीज से नीम। घोड़े का बच्चा घोडा ही होता है और शेर का शेर। गोरे माँ बाप के बच्चे गोरे ही होते हैं और सांवले मां बाप के सांवले। इन सब का आधार हैं डीएनए और जीन। हर माँ की कोख में बीज रूप कोशिका होती हैं जिस में एक कोड लिखा रहता है। इसी तरह से हर बाप के शुक्राणु रूप कोशिका में एक कोड़ लिखा रहता है। बीज और शुक्राणु मिल कर एक योग बनाते हैं। इस में माँ और बाप दोनों के गुणों के कोड सम्मिलित हो जाते है। यह कोड एक धागा नुमा रसायन पर गांठों के रूप में होता है। हर गांठ को जीन कहते हैं और हर धागे को डीएनए। यह गांठ और डीएनए एक तरह का साँचा है। जिन्हों ने ईंटों का भट्टा देखा है वह समझ जाएँगे। वहां सब ईंटे एक जैसी ही बनती हैं। वह इस लिए कि उनको एक ही सांचे से निकाला जाता है। अगर आप को तरह तरह की ईंट चाहिए तो तरह तरह के सांचे बना लो। फिर इन ईंटो से चाहे आप जिस तरह का मकान बना लो। जीन भी एक प्रकार का साँचा ही है। जिस से जीव के शरीर की बाकी कोशिकाएं ईंटो की तरह बन जाती हैं। डॉ खुराना ने इसी चीज़ का आविष्कार किया था कि कैसे डीएनए रुपी सांचे से प्रोटीन बनते हैं जिस से बाकी कोशिका और शरीर बनता है। इस क्रिया को समझने के उपरान्त धीरे धीरे जेनेटिक इंजीनियरिंग का जन्म हुआ जिस से आजकल कई इलाज संभव हैं। नमन है इस महान खोज को जिस के डॉक्टर खुराना सहभागी थे। आइये जानते हैं उनकी पृष्ठभूमि को।
डॉक्टर खुराना का जन्म मुल्तान जिले के एक छोटे से गाँव रायपुर में हुआ था। यह धुल भरा गाँव इतना छोटा था कि उन दिनों वहां केवल सौ लोग ही रहते होंगे। 9 जनवरी 1922 को खुराना परिवार में सबसे छोटे बेटे का जन्म हुआ जिस का नाम हरगोबिंद रखा गया। और वह शायद इस लिए कि उस दिन गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म दिवस और गुरुपर्व भी मनाया जा रहा था। उनके तीन भाई और एक बहन थी जो उनसे बढे थे। परिवार शायद समृद्ध नहीं था हालांकि खुराना उपनाम शायद यह दर्शाता है कि परिवार एक कुएं के मालिक थे और गाँव में कुआँ होना सौभाग्य कहा जा सकता है। हरगोबिंद के पिता श्री गणपत राय जी एक पटवारी थे।
डॉक्टर खुराना के पौत्र लिखते हैं की “हम बहुत कम जानते हैं कि गोबिंद लड़का कैसे बड़ा हुआ, हालाँकि पारिवार में ज़िक्र होता है कि वह एक शरारती बच्चा था जो गन्ने के खेतों से गन्ना चुराना पसंद करता था। गोबिंद का लालन पालन जिस घर में हुआ वह उन दिनों के सामान्य ग्रामीण घर के जैसा ही था जिस के एक कोने में एक चूल्हा चौका और कच्चा कोठड़ा था और एक आंगन के दुसरे छोर में गायों और घोड़ों का हिस्सा था। उस समय उनके गाँव रायपुर में कोई स्कूल नहीं था। आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि ऐसी परिस्थिति में बचपन गुज़ारने वाले बच्चे ने क्या कर दिखाया।
असल में उनके पटवारी पिता शिक्षा को बहुत महत्व देते थे और उन्हों ने ही शिशु गोबिंद को अनौपचारिक रूप से प्रार्थमिक पढ़ना लिखना घर पर ही सिखाया। आपने चार भाई-बहन समेत उनका परिवार ही गाँव में एकमात्र साक्षर परिवार था। जैसे-जैसे गोबिंद बड़ा होता गया, उस ने मुल्तान के दयानंद एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल में पढ़ाई की। जब वह 18 वर्ष के हुए, तो उन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। प्रतिभावान् विद्यार्थी होने के कारण विद्यालय तथा कालेज में इन्हें छात्रवृत्तियाँ मिलीं। पंजाब विश्विद्यालय से सन् 1943 में बी. एस-सी. (आनर्स) तथा सन् 1945 में एम. एस-सी. (ऑनर्स) परीक्षाओं में ये उत्तीर्ण हुए तथा छात्रवृत्ति पाकर इंग्लॅण्ड गए। वहाँ लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ए. रॉबर्टसन् के अधीन अनुसंधान कर इन्होंने डाक्टरैट की उपाधि प्राप्त की। इन्हें फिर भारत सरकार से शोधवृत्ति मिलीं और ये जूरिख (स्विट्सरलैंड) के फेडरल इंस्टिटयूट ऑव टेक्नॉलोजी में प्रोफेसर वी. प्रेलॉग के साथ अन्वेषण में प्रवृत्त हुए। भारत में वापस आकर डाक्टर खुराना को अपने योग्य कोई काम न मिला। हारकर इंग्लैंड चले गए, जहाँ कैंब्रिज विश्व विद्यालय में सदस्यता तथा लार्ड टाड के साथ कार्य करने का अवसर मिला। सन् 1952 में आप वैंकूवर, कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया अनुसंधान परिषद् के जैवरसायन विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। सन् 1960 में इन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका के विस्कान्सिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑव एन्ज़ाइम रिसर्च में प्रोफेसर का पद पाया। यहाँ उन्होंने अमरीकी नागरिकता स्वीकार कर ली। देश में कुछ तथाकथित बुद्धि जीवी ऐसे भी हैं जो इस बात पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं कि सफल डॉ खुराना देश वापिस क्यों नहीं आये। जब कि सच्चाई यह है कि भारत में वापस आकर डाक्टर खुराना को अपने योग्य कोई काम न मिला। हारकर इंग्लैंड चले गए। ऐसा नहीं कि डॉ खुराना को अपनी मातृभूमि से प्यार नहीं था। जब उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो तब वह मात्र 48 वर्ष की आयु के थे। और उस के पश्चात भी उन्हों ने बहुत महत्वपूर्ण अनुसन्धान किये।
अगस्त 1947 में भारत आज़ाद तो हुआ परन्तु पंजाब के दो हिस्से हो गए। उस समय हिंदुओं, सिखों को देश का वह हिस्सा छोड़ कर उस हिस्से में आना पड़ा जो शेष भारत था और कई मुसलमानों को उस हिस्से में जाना पड़ा जो अब पकिस्तान बन गया था। इतनी संख्या में लोग बेघर हो गए और बहुत कत्ले आम भी हुआ। हरगोबिंद के परिवार को भी आपने घर, गाँव और मुल्तान को छोड़ना पड़ा जो पकिस्तान का हिस्सा बन गया था। माली नुक्सान तो हुआ परन्तु सौभाग्यवश किसी जानी नुक्सान बिना उनका परिवार भारत वर्ष में पहुँच गया। विदेश में बैठे हरगोविंद को इस सब का बहुत फ़िक्र रहा और उस के बाद वह कभी आपने पैतृक गाँव नहीं जा पाए। वह धुल भरा गाँव रायपुर आज भी वही है, वह आँगन भी शायद वहीँ है जिस में शरारती हरगोविंद आपने चार भाई बहनो के साथ शरारते करते थे और वह गन्ने के खेत भी वहीँ हैं जिन से गोबिंद गन्ने चुरा लिया करते थे। वह स्कूल भी अभी लाहौर में है जिस में उनहोंने पढाई की। शायद आज का पाकिस्तान भी इस बात का गर्व करता होगा की डॉ हरगोबिंद खुराना का जन्म उस भूभाग में हुआ जो आजकल उनका हिस्सा है।
भारत को तो आपने महान सपूत पर गर्व होना स्वाभाविक है। शायद उनकी सफलता के कारण विज्ञान की शिक्षा का ऐसा दौर चला कि भारत की पीढ़ी दर पीढ़ी आजकल विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सफलता हासिल कर रही है। भारत के साथ साथ वह सब शिक्षा संसथान और सभी देश भी इस बात का गर्व मह्सूस करते हैं जिन में डॉ खुराना का सम्बंद रहा जैसे पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़; लिवरपूल विश्वविद्यालय, इंग्लॅण्ड; कैंब्रिज विश्व विद्यालय, इंग्लॅण्ड; ब्रिटिश कोलंबिया अनुसंधान परिषद्, कनाडा; विस्कान्सिन विश्वविद्यालय, अमरीका इत्यादि। हम कह सकते हैं की डॉ खुराना विश्व के नागरिक हैं और इस तरह की शख्सीयत के कारण ही वासुदेव कटुभ्कम को हम संभव कर सकते हैं।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
10.01.2022
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